Top News:

नज़रियाः बीजेपी को असम की नहीं, आम चुनाव की चिंता?



भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित कुमार शाह को एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण से नया उत्साह मिल गया है. वे हुँकारा भरते हुए कहते फिर रहे हैं कि "विदेशी नागरिकों को चुन-चुनकर निकालूँगा." उन्हें हिंदू ध्रुवीकरण का नया मंत्र मिल गया है और अब वे इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुट गए हैं. और अमित शाह ही क्यों, तमाम बीजेपी नेताओं ने इसे नए जुमले की तरह दोहराना शुरू कर दिया है. उन्हें लग रहा है कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा की छौंक लगाकर इस विवाद को चुनावों में भुनाया जा सकता है.

धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने की इसमें उन्हें अच्छी-खासी गुंज़ाइश दिखाई दे रही है इसलिए उन्होंने इसे तपाना शुरू कर दिया है. विदेशी घुसपैठ के मुद्दे को बीजेपी असम में काफ़ी अरसे से भुनाने की कोशिश करती आ रही है और उसे इसमें सफलता भी मिली है. एनआरसी के रूप में उसके भाग्य से छींका भी टूट गया और अब अमित शाह चालीस लाख विदेशियों का विवादित आँकड़ा बताकर चुनावी अभियान पर निकल पड़े हैं.

लेकिन असम बीजेपी धर्मसंकट में

हालाँकि राष्ट्रीय नेतृत्व के रुख़ के विपरीत असम में बीजेपी एनआरसी के सवाल पर धर्मसंकट में फँसी हुई है. वह अमित शाह की तरह आक्रामक नहीं हो पा रही. इसकी वज़ह भी साफ़ है. एनआरसी की अंतिम सूची में केवल मुसलमानों के ही नाम नहीं हैं. उसमें बड़ी तादाद में हिंदू भी शामिल हैं. और तो और अंतिम सूची के हिसाब से उसके कई नेताओं या उनके परिजनों की नागरिकता भी ख़तरे में है. उसके विधायक रमाकांत देउरी और उनके परिजनों के नाम सूची में नहीं है.

इसके अलावा जनजातियों और गोरखा लोगों की तादाद भी अच्छी ख़ासी है. हिंदू जनजाति नामशूद्र के ही छह लाख लोगों के नाम सूची में नहीं हैं. वे पचास के दशक से बांग्लादेश से आकर बसते रहे हैं. फिर चालीस लाख का आँकड़ा आगे जाकर कितना कम होगा इसका पता नहीं है. संभावना है कि इसमें उल्लेखनीय कमी आएगी. ऐसी सूरत में विदेशी नागरिकों की संख्या के बारे में जो दावे वह करती रही है उसकी हवा भी निकल सकती है.

ज़ाहिर है कि ऐसे में असम बीजेपी एनआरसी के बल पर उछल-कूद नहीं कर सकती और करेगी तो उसे स्थानीय लोगों की नाराज़गी का सामना करना पड़ेगा.

Souerce BBC